nirjala ekadashi vrat katha 2026
निर्जला एकादसी 25जून 2026 एकादशी शुक्ल पक्ष ज्येष्ठ अमावास्यंत को है
निर्जला एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा
प्राचीन समय की बात है। महाभारत काल में पांडवों में सबसे बलशाली भीमसेन थे। वे बहुत अधिक भोजन करने वाले थे और उनकी भूख भी अत्यधिक थी। उनके भाई—युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव—तथा माता कुंती सभी श्रद्धा से हर एकादशी का व्रत रखते थे।
लेकिन भीमसेन के लिए यह व्रत करना अत्यंत कठिन था। उन्होंने कई बार प्रयास किया, परंतु भूख के कारण वे व्रत पूरा नहीं कर पाते थे। इस कारण उनके मन में चिंता उत्पन्न हुई कि वे धर्म का पालन नहीं कर पा रहे हैं और अन्य पांडवों की तरह पुण्य अर्जित नहीं कर पा रहे।
एक दिन उन्होंने इस समस्या का समाधान जानने के लिए महान ऋषि वेद व्यास जी के पास जाकर विनम्रता से कहा—
“हे गुरुदेव! मैं अत्यधिक भूखा रहने वाला व्यक्ति हूँ। मेरे पेट में अग्नि (जठराग्नि) बहुत प्रबल है, इसलिए मैं हर एकादशी का व्रत नहीं कर सकता। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए।”
भीमसेन की बात सुनकर व्यास जी ने कुछ क्षण विचार किया और फिर बोले—
“हे भीम! यदि तुम सभी एकादशी का व्रत नहीं कर सकते, तो वर्ष में केवल एक दिन ‘ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी’ को कठोर नियम से व्रत करो। यह ‘निर्जला एकादशी’ कहलाती है। इस दिन तुम बिना अन्न और बिना जल के उपवास करना। यदि तुम यह व्रत पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करोगे, तो तुम्हें पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का फल प्राप्त होगा।”
यह सुनकर भीमसेन चिंतित हुए, क्योंकि बिना पानी के रहना उनके लिए और भी कठिन था। लेकिन उन्होंने निश्चय किया कि वे इस एक दिन का व्रत अवश्य करेंगे।
समय आने पर ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी आई। भीमसेन ने प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान किया और व्रत का संकल्प लिया। पूरे दिन उन्होंने न तो अन्न ग्रहण किया और न ही जल पिया। तपती गर्मी के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को नहीं तोड़ा और पूरे दिन भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहे।
रात्रि में उन्होंने जागरण किया और भगवान का नाम-स्मरण करते रहे। द्वादशी के दिन प्रातःकाल उन्होंने विधिपूर्वक पूजा की, ब्राह्मणों को दान दिया और तब जाकर व्रत का पारण किया।
भीमसेन की इस कठोर तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर कहा—
“हे भीम! तुमने अत्यंत कठिन व्रत को पूर्ण किया है। आज से जो भी मनुष्य इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत विधि-विधान से करेगा, उसे सभी एकादशियों का फल प्राप्त होगा। उसके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।”
इस प्रकार निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत महान और फलदायी माना गया। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि भीमसेन ने ही इस व्रत का पालन कर इसका महत्व स्थापित किया।
